आँखों को भींच कर न कोई ख़्वाब देखिए,
शब-ए-हुस्न पर चढ़ा शबाब देखिए।
हैं निकालते कमी औरों में बेझिझक,
अपना गिरेबां पहले जनाब देखिए।
मय की है तलब तो न बाज़ार घूमिए,
हमनवां के नक्श, लब-गुलाब देखिए।
जो वजूद ख़ुद का खो बैठा प्यार में,
कहते सब उसको 'पागल' ख़िताब देखिए।
गफलत में उम्र काटी सारी अब इश्क़ में,
छोड़ें ये फलसफे कोई किताब देखिए।
दरिया ने समंदर से मिलने का सोचा जब,
बनता ज़माना बीच का दोआब देखिए।
-स्वरांजलि 'सावन'


