मैं स्वयं को देखती प्रियवर नयन से,

वे कहें अभिराम तो अभिराम हूँ मैं!

गात यष्टि लख मेरी यदि वे कहेंगे,

हो सरल निष्काम तो निष्काम हूँ मैं।


यह प्रणय सम्वाद तो सीधा-सरल है,

योग अमृत तुल्य और विरहा गरल है!

है हृदय निस्पन्दनों में भाव शुचिता;

औश्र निश्छल प्रेम का बहता तरल है!

सुन के कल-कल प्रीत की अविरल ध्वनि को,

प्रिय कहें शुचि धाम तो शुचि धाम हूँ मैं।


स्निग्धता परिपूर्ण यदि स्पर्श होगा,

अंतरंगी भावना को हर्ष होगा!

बंधनों में मुक्ति का आभास हो तो;

हाँ वही सम्बन्ध का उत्कर्ष होगा!

कस मुझे अनुबंध की अपनी कसौटी,

वे कहें दिनमान तो दिनमान हूँ मैं।


यदि समर्पण स्वार्थमय संकल्पना है,

पूर्णता तब लेश कोरी कल्पना है!

और जहाँ व्यापी नहीं है स्वार्थपरता,

पूर्ण जीवन की वहीं शुभ अल्पना है!

प्राप्त कर संशय रहित मेरा समर्पण,

यदि करें अभिमान तो अभिमान हूँ मैं।


-स्वरांजलि 'सावन'