'जीवन का स्वाद'
उफ्फ, ये बच्चा कहा रो रहा हैं
उसे क्या नहीं पता मालिक सो रहा हैं
उठा तिल-मिलाकर , उसे पीटने
उतरा ऊपर से तो लगा देखने:
चुप-चुप कहकर उसकी मा पुचकार रही थी
मगर उसकी वो भूखी आंखे, इस ना को नकार रही थी,
ज्यादा नहीं सिर्फ़ चार साल का लवंडा था
कोने में ऐसे पड़ा लगता जैसे डंडा था;
लौट आया मालिक, गुस्सा ठंडा करते,
मालिक ने दीन-दृष्टि डाली उसकी मां पर
भेजा नौकर, की लाए उसे बुलाकर;
दया-दृष्टि के सारे हथकंडे मालिक जानता था
नौकर वही भेजा जो मां को जानता था,
'चल मुनिया' तुझ पर मालिक कुर्बान हैं.... नहीं मेहरबान है..
लगी सोचने भोली मुनिया की, साहब कैसा इंसान है?
'महल वाले विश्वास पात्र तो नहीं', जानती ही हूं
'शायद इसीलिए मालिक ने भेजा है नौकर'
गर्व कर अपने विवेक पर पहुंची वो दौड़कर,
घुसी जो अंदर तो आंखे फट गई,
बेटा है बीमार उस क्षण को ये बात बुद्धि से हट गई!
देख उतरते मालिक साहब को नौकर ने विदा ली,
जाते जाते मुनिया को झुकने की सलाह दी,
अाई मुनिया फ़िर अपने रोने में
हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई, कोने में
डाल मुनिया पर अपनी नज़र
मालिक आगे बढ़ा,
था अभी तक वो कुछ दूर खड़ा,
'हल्ला क्यों हो रहा था इत्ती रात को'
'बेझिझक बोलो मुनिया पूरी बात को'
कहकर इतना मालिक और समीप आ गया
मुनिया ने सोचा भटके मल्लाह का द्वीप आ गया
३ महीने पहिले डॉक्टर को बुलावा भेजा था
केह गया था कि लल्लन को "हैजा" था!
'तब से न खात है न पीयत है
भिनाहिय से साझे तक रोवत है'
केहकर इतना मुनिया ने ऊपर देखा तो
मालिक उसको ही देख रहा था,
एक क्षण को उसे लगा वो आंखे सेक रहा था
मालिक ने कहा,
'पहले बताना था तुम्हें,तुम क्यों इतनी परेशान हो',
नाले के उस पार ही सही तुम भी हमारी रान हो;
सुन चुपड़ी बाते मालिक की मुनिया ने ख़ुद को कोसा,
थोड़ी सी खुली और किया भरोसा,
चिकनी चुपड़ी बातो से मुनिया को मालिक ने फसा लिया,
इलाज के पैसे देने को कमरे में बुला लिया;
मुनिया हिचकी! पर विश्वास किया
मार अपने विवेक को चैन की सांस लिया
मालिक आगे मुनिया पीछे से, आ गई ऊपर नीचे से,
बाद में मुनिया, पहले मालिक दाख़िल हुआ
कमरा ही अब दोनों की मंज़िल हुआ,
मुनिया ने कमरा देखा, वातावरण बड़ा शुद्ध था
बिस्तर कायदे से, बगल मेज़ पर बैठा बुद्ध था;
पैसा निकाल मालिक सोफे पर आसीन था,
मुनिया के लिए दृश्य बहुत दीन था,
मुनिया ने हाथ बढ़ाए मगर मालिक ने पैसे न दिए
अब समझी मुनिया की महल वाला कितना हीन था;
साहब ने पहले अपना अंगरखा खोला
पैसे रख़ कर मेज़ पर, फ़िर बोला:-
'देखो मुनिया, समझदार हो तुम अब न कोई बात करो,
जितनी सुंदर तुम हो उतनी सुंदर रात करो:
रो-धो कर माहौल ना गमगीन करना,
पैसे चाहिए तो ये रात रंगीन करना'
मालिक ने भी ज़हर परोसा सोने कि थाल में
मुनिया बेचारी फस गई जाल में;
सोचा मुनिया ने इज्जत बचाऊ तो पैसे जाए
पैसे जाए तो लाल जाए,
क्यों ना इस राक्षस की बात मान जाए!
देख खामोशी मुनिया की मालिक ने उसको खीच लिया,
मुनिया ने न इनकार किया और
उस दानव ने नन्ही जान को बाहों में भीच लिया,
खा कर पान का बीड़ा, मालिक ने शुरू की काम क्रीड़ा;
बंद कमरे का कपाट हो गया,
आशियाना अब खाट हो गया;
मुनिया,मालिक साथ जगे थे
देखा घड़ी तो चार बजे थे,
उठकर पैसे मुनिया को मालिक ने दिया
'बिना मेहनत के मेहनताना नहीं मिलता' कह कर फिर,
उसके होठों का रसपान किया!
बटोर कर पैसे मुनिया रोती चली गई,
मालिक हसा और सोचा एक और कली मिल गई,
लगा देखने इधर उधर कमरे में
बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा गायब थी
गौर किया तो नीचे गिरी थी!
पर उसमें से प्रतिभा गायब थी!
मुनिया ने सोचा, लल्लन ठीक हो गया तो
उस देख ये काली रात (जो अब और काली लग थी) याद आएगी,
फिर सोचा ये सब लाल के ठीक होने के बाद आएगी;
इधर मुनिया ने दोनों दुनिया को बाटने
वाला नाला पार कर लिया,
ख़ुद को फ़िर से आगे के लिए तैयार किया,
बढ़ी चली अपने हुजरे की तरफ़,
लल्लन को तैयार कर अस्पताल ले जाएगी
अपने लाल के लिए अच्छी दवाई ले आएगी
देख अपने लाल को द्वार पर ही उसकी रंगत पूरी उड़ गई;
अपने असुओ से लीप कर घर को महल की तरफ़ मुड़ गई;
घर छोड़ते ही मुनिया के, घर में काल गया था,
उसी के तन की बेदी पर उसका लाल गया था।
मुनिया हुई पागल, कर रही हाय हाय
मन मतंग मानत नहीं, जब तक खता न खाय
हाथ में बेटा, गिरे नोट पीछे, और एक काली रात उसके भी पीछे
कोई बताओ दुखिया कहा जाय;
दो दुनिया को बाटता जो वो नाला है
तकता दोनों तरफ़ हैं
एक तरफ़ दिन काले हैं, एक तरफ़ मन काला है
क्रियाकर्म के बाद मुनिया लौटी और
नोट उठा ली और रख लिया,
ये एक निशानी थी कि उसने आज
जीवन चख लिया। शिवम् तिवारी 'सुवास'