आदमी का मन सुशील शर्मा आदमी का मन जन्मता है शुद्ध। छल छंद में पड़कर हो जाता है अशुद्ध। मन स्पंदित होता है। जब अपना कोई पास होता है। प्यार के खनकते शब्दों में खोता है मन चेतना और वेदना को गाता है दर्द की आहटों को सहलाता है । प्रेम के प्रमेय को सुलझाता है। मन समंदर के तूफानों से टकराता है। अपने और बेगाने रिश्तों से मार खाता है। दर्द की दुकानों पर बेचा जाता है। मन सूरज सा जलता है चाँद सा पिघलता है उपवन सा खिलता है। मन नदी सा बहता है सुख दुख सहता है न जाने कहाँ रहता है। मन जंगलों सा सुनसान है रेगिस्तान सा वीरान है कुछ हारा सा हैरान है। मन कुछ राग कुछ रंजिशें लपेटे है कुछ सपने कुछ ख्वाहिशें समेटे है वेदना के सांचों में शब्दों सा धंसा मन। मैं के मुक्तक में अंदर तक फंसा मन। थोड़ा तेरा मन थोड़ा मेरा मन हम सबका मन।