विचारों की सिगड़ी जलाये बैठा था न जाने कब से। कागज़ की पतीली में आखिरकार दो कप उड़ेल ही दिया यादें तुम्हारी। माफ करना बिन पूछे। उबालता रहा बहुत देर, फिर एक चम्मच मेरी कल्पनायें और साथ ही कुछ शब्दों का कड़कपन डाल उबलने दिया कुछ और वक़्त।

थी तैयार फिर मेरी एक प्याली चाय जिसके हर चुस्की में वो मिठास तो नहीं जो थी जब तुम थी साथ पर हाँ वो ख़ुशबू जरूर है अब भी। ऐसे ही करता हूँ जब भी उठती है तलब तुम्हारी। मेरे हाथ की बनी चाय पीने कभी आओ ना तुम भी।

#प्रयास