यकीन!
यकीन तो पक्का ना था,
के मंज़िल पर साथ होगी मेरे।
मगर,हठ थी!
के रहेगी साथ सफर में।
जुनून इस कदर के,
चेहरे पर उभरी बेवक़्त सिलवटें,
हँस के नज़रअंदाज़ कर दे देती थी,
ताकि हिम्मत ना उधड़ जाए कहीं मेरी।
आखिरी साँस उखड़ने से पहले
वादा ले ही गयी मुझ से,
मंज़िल पर पहुँच कर ही दम लेने की।
बस,
बस इसलिए सफर में हूँ
अलबत्ता अकेला ही अब,
उसके आदर्शो का चिराग लिए
ताकि मंज़िल पर जब भी पहुँचूँ
तो दूर कहीं से देख मुझे
कर सके नाज़ मुझ पर,मेरी
चप्पल।
#सुशील'कुमार'