कुछ तो अलग देखा उस दिन, जब मैं था बाहर कहीं
जहाँ खड़ा था मैं, रखा उन्होंने वो 'डेक' वहीं...
एक ने हुँकार भरी, "आ जाओ भंडारा लगा है"
सबने देखा कि वहाँ कुछ दुकान सा सजा है...
सब अपने कामों में लगे थे मच गयी जैसे भगदड़ तभी
कटोरी भर हलवा वो लेना चाहते थे सभी...
बच्चे औरत बूढ़े जवान लिया सभी ने प्रसाद वो
धक्का मुक्की करके भी फ़ैलाया अपने हाथ को...
मेरे मन में वहां बस यही सवाल आया था
इस भंडारे को किसने और आख़िर क्यों कराया था?
किसी ने कहा मुझसे ये तो समाज सेवा है
जनाब ये सुन के तो मैं और भी उलझ गया...
समाज सेवा के नाम पे झूठी शान दिखानी थी
मंशा मैं उनकी बस वहीं समझ गया...
फिर उनके ही एक कर्मी ने मुझे बताया
इस भण्डारे को हमने पैसा मिला के कराया है...
फिर उसने ख़ुद ही बारीक़ी से समझाया
कि हमारे लोगों ने ही आज सबसे ज़्यादा खाया है...
यहाँ तो बस हलवा का इंतज़ाम है
अंदर तो अभी लंच का भी प्रोग्राम है...
फिर थोड़ी सी नसीहत मैंने भी उसे दे डाली
बोला, जो भूखे हैं उनकी भर के देखो थाली...
करनी है समाज सेवा तो ज़रूरतमन्द को देखो
वरना ये समाजसेवी का चोला उतार फेंको...
ऐसे भंडारे से तुम कुछ पुण्य ना पाओगे
जहाँ अपने पैसों का हिसाब लगा कर खाओगे...
ऐसे भंडारों में कारों से उतर कर भी ग़रीब आते हैं
और जिनको ये मिलना चाहिए, वो शायद ही खाते हैं..
जल्दी में था कुछ, तो बस मैं वहाँ से चल दिया
देख के ऐसा सोशलवर्क खीझता हुआ निकल गया...