कुछ छा गया कुहाँसा जिन्दगी में यूँ, कि आग दिल मे कुछ जलाई ऐसे, काले धुएँ सी जिन्दगी हो गयी है, कि अब कोई राह दिखे भी तो कैसे।   फना कर आई जिन्दगी को हमारी, कि अब तेरे बिना जिये भी तो कैसे, हर ज़र्रे मे समायी कूछ यूँ तू हमारे, कि अब तुझको भूल भी जाऊँ तो कैसे।   हर लमहे में जहाँ दस्तक लगी हो तेरी, कि मै उन लमहो को घटाऊँ तो कैसे, जब हर आईनों में शकल दिखती है तेरी, कि उन शीशों कों अब दफनाऊं तो कैसे।   हर दरख्तों मे यहाँ संजो रखा है तुझे, उन लकड़ियों में आग लगाऊँ तो कैसे, रगों मे खून की माफिक दौड़ा रखा है तुझे, कि तेरे बगैर अब दिल धड़काऊँ तो कैसे।   हर रकबा जहाँं का का नाम कर दिया तेरे, कि वहाँ बिन तेरे दो कदम चलूँ तो कैसे, साथ उम्र भर का जो माँगा था रब से मैंने, कि तेरे बिन अब दो लम्हा भी जी जाऊँ तो कैसे॥