वही पुरानी साज़िश है, वही पुराना काज,
बाँट के इस देश को, करना चाहते हैं वो राज।
मत कर हिन्दू -हिन्दू , मत कर मुसलमान,
तू है इस सबसे ऊपर, तू है इक सच्चा इंसान।
ना बुरा है हिन्दू, ना बुरा मुसलमान,
सब हैं मोहरे सत्ता के, इस सबसे अनजान।
वो कहते है किसको आतंकी?
आतंक का तो कोई धर्म नहीं होता।
क्या फ़र्क़ है उनमें और आतंकियों में,
देशवासियों के सिर में जो है लाठियाँ पिरोता।
है मिश्रण सब जातियों ,धर्मों का,
इसीलिए ये धरती तो रंगीन है।
जो पृथक् हो जाए कोई भी, तो क्या इसका वजूद ,
ये तो फिर अर्थहीन है।
ये धरती है ‘चंद्रशेखर’ की, बहरूपिया जो आज़ाद था,
यही एक शब्द उसकी पहचान,बाक़ी सब उसके बाद था ।
ना था जिसका कोई धर्म, ये धरती है ‘कलाम’ की,
पूरी ज़िंदगी जिसने भारत , और हर भारतीय के नाम की।
मिली हैं क़ुर्बानियाँ तुझे विरासत में इन सब से,
भूल गया तू खुद को, मूक बना है कब से।
हिला के रख दे उनकी बुनियाद , इस लहर में है इतना दम,
ये ख़्याल तू रखना बस , कि हिम्मत कभी ना हो कम।
मिलजुल के इक दूजे के साथ जो हम चल पाएँगे,
यक़ीं रखना तो ही वजूद हम, इस देश का बचा पाएँगे।
सुरूचि बाँसल


