हाथरस
कल फिर से इक ख़बर सुनी, माँ दुर्गा के इस देश में;
बेटियों के दुश्मन घूम रहे, ना जाने किस किस वेष में।
सिस्टम की टूटी रीढ़ है, मीडिया की कटी ज़ुबान है,
फिर भी देश सुरक्षित है, महफ़ूज़ है , यही गान है।
स्वतंत्र हुए इस देश को यूँ तो बीत गये कई साल
जन्म से पहले ही किन्तु बेटियों पर, यहाँ देते हैं कफ़न डाल।
मर गयी है आत्मा, क्यूँ आह भी हम भरते नहीं
आ गया है इतना वहशीपन, ख़ुद से क्यूँ हम डरते नहीं।
बन गये हैं रक्षक ही भक्षक, इस वक़्त की यही दुहाई है,
कुछ दरिंदों ने मिलकर रात में ही, लाश भी उसकी जलाई है।
जल गयी वो बेटी साथ ही, जल जाएँगे सबूत जो पुख़्ता हैं,
जो हो रहा इस देश में, देख कर ये सिर झुकता है।
सुरूचि
