जा रही हो दूर आप जानता हूँ किन्तु सुनो, नेह पे ये नेह की कहानी रह जायेगी।
जेठ की दुपहरी में तन जल जायेगा तो , शाम मेरे नाम पे सुहानी रह जायेगी।
सुधियाँ ही सुधियों की राह रोक लेंगीं जब, अधरों पे कांपती जवानी रह जायेगी।
साजन की अंजुरी पे अंजुरी का भार होगा, देह पे ये देह की निशानी रह जायेगी।

सुरजीत मान जलईया सिंह