अंतर्मन


अंतर्मन के संवाद

कभी चुप नही होते

एक गुफ़्तगू-सी रहती है

तुम से निरत

ऐसे-

जैसे, दूब की जड़ें

माटी में छुपके करती हैं 

परस्पर आलिंगन,

और

बांटती हैं अपने मन का दर्द

और कुंठाएं..!


 

सुरेन्द्र सिंह