तुम्हारी ज़ुल्फ के साये में अभी हाल बैठा हूं,
तुम्हें जाने की जल्दी मैं मगर फ़ुर्सत में बैठा हूं ।
तेरे इक दीद के आगे भला ये मिल्कियत क्या है,
ज़मीनें छोड़कर अपनी मैं तेरे दर पे बैठा हूं ।
मेरे वजूद का अपना कोई वजूद नहीं है,
तू जो कह दे हूं कचोरी तू जो कह दे मैं पेठा हूं ।
मैं बाप हूं ! बच्चों की हर ख़्वाहिश पे मरता हूं,
मगर जीना है ज़िंदाबाद कि मैं अब भी बेटा हूं ।
महीनों से मुझे इस नींद ने आगोश न लिया,
मैं बिस्तर बेच के अपना अब इस जंगल में लेटा हूं ।
सूरज प्रकाश राजवंशी


