कहता है ये कौन फ़साना सड़कों पे
होता है अब रोज़ तमाशा सड़कों पे ।
सच की सुनवाई होती है बन्द कमरों में
झूठों का है हक़ चिल्लाना सड़कों पे ।
हिम्मत है या लाचारी इन मांओं की क्या जानूं
आसॉ है क्या यूं आ जाना सड़कों पे ।
बिजली पानी राशन किसकी ज़िम्मेदारी है
क्यूं होता है शोर शराबा सड़कों पे ।
आओ बैठो मेरे मन की भी सुन लो
छोड़ो भी ये आग लगाना सड़कों पे ।
सूरज प्रकाश राजवंशी


