वो कांधे कब मेरे कांधों से इतर हुए हैंवो कांधे जिन पे बैठ के हम शिखर हुए हैं,जिन कांधों को आज मैं कांधा देकर आया हूंवो कांधे मेरे बोझ से अब तक दबे हुए हैं ।सूरज प्रकाश राजवंशी
वो कांधे कब मेरे कांधों से इतर हुए हैंवो कांधे जिन पे बैठ के हम शिखर हुए हैं,
जिन कांधों को आज मैं कांधा देकर आया हूंवो कांधे मेरे बोझ से अब तक दबे हुए हैं ।
सूरज प्रकाश राजवंशी