एक ग़ज़ल -


ये दर्द मेरे दिल से संभाला नहीं जाता,

हद है कि फिर भी दिल से निकाला नहीं जाता ।


चेहरों पे अब वो नूर सी रौनक नहीं दिखती,

लगता है ढंग से मूंह में निवाला नहीं जाता ।


महलों की ड्योढ़ीयों की दिवाली नहीं जाती,

मेहनतकशों के घर का दिवाला नहीं जाता ।


वो गैरों के घर में ख़ूब निभाता है दोस्ती,

घर में कोई रूठे तो संभाला नहीं जाता ।


दिल मेरा पूरी तरह टूटा तो है लेकिन,

दिल से वो दिल को तोड़ने वाला नहीं जाता ।


सूरज प्रकाश राजवंशी