रोक क्या है किसी के देने पे,

कुछ तो पाबंदियां हैं लेने पे ।


अब क्यूं कोई दहेज़ भी मांगे

बेटी वाला अड़ा है देने पे ।


लाख हों दर्द फिर भी नैमत है

क्यूं तू आता है जान देने पे ।


मुहब्बत में जो हां करी समझो

सर को रक्खा है तीर पैने पे ।


दुआ को होंठ पे सजा 'सूरज'

हाथ को रख तू नाव खेने पे ।


सूरज प्रकाश राजवंशी