बड़े मायूस इधर और उधर से हो के,
तमाम रात गुज़ारी है उन्होंने रो के ।
वो अपनी ख़ुद्दारियों पे आंच न आने देंगे,
पेट खाली हैं मगर रक्खे हैं बर्तन धो के ।
जिसके कांधों पे मेरे चूल्हे की ज़िम्मेदारी है,
रक़्स करता है वो अय्यार नशे में हो के ।
मैं उसका होंसला समझूं या बेबसी समझूं
निकल चुका है जो रस्ते पे पांव न हो के ।
सौदागिरी से नफ़रतों की जूझते, लड़ते,
शख़्स इक आज ही गुज़रा है परेशां हो के ।
मेरे हिस्से की अभी मौत भी क्या बाकी है,
रोज़ मरता हूं मैं सड़कों पे तमाशा हो के ।
सूरज प्रकाश राजवंशी


