
बड़े मायूस इधर और उधर से हो के,
तमाम रात गुज़ारी है उन्होंने रो के ।
वो अपनी ख़ुद्दारियों पे आंच न आने देंगे,
पेट खाली हैं मगर रक्खे हैं बर्तन धो के ।
जिसके कांधों पे मेरे चूल्हे की ज़िम्मेदारी है,
रक़्स करता है वो अय्यार नशे में हो के ।
मैं उसका
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