ग़ज़ल -'s image

बड़े मायूस इधर और उधर से हो के,

तमाम रात गुज़ारी है उन्होंने रो के ।


वो अपनी ख़ुद्दारियों पे आंच न आने देंगे,

पेट खाली हैं मगर रक्खे हैं बर्तन धो के ।


जिसके कांधों पे मेरे चूल्हे की ज़िम्मेदारी है,

रक़्स करता है वो अय्यार नशे में हो के ।


मैं उसका

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