मेरी जां तूने मुहब्बत में ये ठाना क्या है,

मेरे ख़्वाबों से मेरी नींद चुराना क्या है ।


आख़िर इक बार पलट के भी दिखा दे सूरत,

ऐसे जाते हो ये जाने का जताना क्या है ।


दिल में कुछ फूल मुआफ़ी के लिए रक्खे हैं,

हो के नाराज़ ज़माने से यूं जाना क्या है ।


दो घड़ी रुक के मेरे दोस्त आ पानी पी ले,

किसको मालूम कि पंछी का ठिकाना क्या है ।


भूल जाने के सलीके मुझे न सिखलाओ,

बस तू इक याद है कुछ और भुलाना क्या है ।


दिल के हर ज़ख़्म का मरहम नहीं मिलता यारों,

ज़ख़्म रिसने दो हकीमों को दिखाना क्या है ।


जिसको होना है उसे ख़ुद पता चल जाएगा *सूरज*

दान दे के उसे पत्थर पे लिखाना क्या है ।


सूरज प्रकाश राजवंशी