मैं अपनी एक किताब लिखूंगा, उसमे करूंगा मैं तेरा ज़िक्र हर पल, हर लफ्ज़ में......


उस किताब में जब मै लिखूंगा किसी समुद्र को, तब तुम्हारी वो आंखें उकेरूंगा.....

उनसे नज़रें मिलाना मैं ऐसे लिखूंगा, जैसे कोई परिंदा पिंजरे से निकल अनंत आकाश में मिल गया हो.....


जब मैं लिखूंगा राजधानी दिल्ली को, तब ज़िक्र करूंगा तुम्हारे दिल का...

तुम्हारे बर्ताव को मैं लिखूंगा अराध्य.... खुबसूरत बिल्कुल अक्षरधाम सा .....


अपनी किताब में जब मै कर रहा होऊंगा ज़िक्र ताज का, तब मैं तुम्हारी वो सादगी लिखूंगा....

तुम्हारी सादगी को मैं लिखूंगा श्वेत.... अद्भुत, संगमरमर सा......


जब करूंगा मैं ज़िक्र किसी खुबसूरत दृश्य का, तब तुम्हारी उन तमाम तस्वीरों को लिखूंगा....

और उन तस्वीरों को निहारना मैं ऐसे लिखूंगा, जैसे कोई देख रहा हो कश्मीर की खूबसूरत वादियों को....


जब मैं ज़िक्र कर रहा होऊंगा नीलगिरी के उन खूबसूरत फूलों का, तो मैं तुम्हारी वो मुस्कान लिखूंगा,

लिखूंगा की वो मुझे वैसा ही सुकूं देती है, जैसे बैठा हूं मैं असम के उन बागानों में.....


जब मैं लिख रहा होऊंगा कानपुर की बदनाम चाय को, तो लिखूंगा वो बिल्कुल तुझ जैसी है,

मीठी के साथ साथ थोड़ी कड़क.... तेरे जिद्दीपने को मैं लिखूंगा इलायची का ज़ायका....


अपनी किताब में जब मैं कर रहा होऊंगा ज़िक्र ऋषिकेश के योग, साधना का, तब मैं लिखूंगा की वो बिल्कुल तुम्हारे कान की बाली सा है....

उन बालियों में तुमको देखना मैं ऐसे लिखूंगा, जैसे मैं झूम रहा हूं, लक्ष्मण झूले पर.....



जब मैं लिख रहा होऊंगा कच्छ के उस सूर्यास्त को, तब मैं लिखूंगा की वो बिल्कुल तुम्हारे होठों जैसा था,

सुर्ख, लाल.... जैसे पुकार रहा हो मुझे..... इक नए और खूबसूरत सफर पर.....



जब मैं कर रहा होऊंगा किसी कोयल के संगीत का ज़िक्र, तब मैं तुम्हारे उन तीन लफ्ज़ों को लिखूंगा,

और लिखूंगा अपनी उस बेइंतहा मोहब्बत को, जो मैं तुमसे अब तक करता आया हूं......



लिखूंगा कि इन सब के बावजूद ये सफर अब भी अधूरा है, कुछ अब भी बाकी है.....

तुम.... हां, अब बस तुम्हारे साथ इस जीवन का सफर पूरा करना है.....



अपनी किताब में मैं ऐसे ही लिखूंगा अपने पूरे सफर को.... करूंगा तेरा ज़िक्र हर पल, हर लफ्ज़ में....

उन अनगिनत पलों को लिखूंगा मैं उस सुनहरी किताब मे, और लिखूंगा की ये सफर मेरा हमसफर है, मेरे इस जीवन का...!!