जो बहा लहू पानी बनके,क़र्ज़ हमपर चढ़ा गया.
अपनी क़ुरबानी के बदले,हमसे बेहतर कल की आस लगा गया.
माँ ने बहुत सहा हैं, इस आज़ादी के वास्ते.
फ़र्ज़ है हमारा उसको दे खुशियां, उसके ज़िन्दगी के आने वाले हर रास्तें.
नफरत छोड़ो चलो प्यार को अपनाये.
क्या पता प्यार बांटते बांटते ही सही,हमपे चढ़े क़र्ज़ की किश्त ही थोड़ी सी मिट जाये.