मैं सोच रही हूं कि हमारे संस्कृति में क्यूं देवताओं को सिंदूर चढ़ाया जाता है... क्या कारण है? सिंदूर तो विवाहिता लगाती हैं, ना की विवाहित ...और ये सोचते सोचते अब मैं ये सोच रही हूं कि

पुरुषों को तो कुछ भी नहीं लगाया जाता...जिससे ज्ञात हो की वो विवाहित है , ना तो सिंदूर ना तो सरनेम .... लड़कियों का ज्यादे सोचना अच्छा नहीं है ...शायद किसी पुरुष ने ही कहां होगा ... किसी सत्ताधारीपुरुष ने.

इसे छोड़ देते है... क्योंकि जिन्होंने पकड़ा है उन्होंने भी कौन सा उखाड़ फेंका हैं.

फिर दिमाग में आते है जिन्हें नही आना चाहिए , देश के सफेदपोश नेता जिन्होंने देश की गरीबी कम करने और आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु पेंशन योजना बंद की... अरे !खुद की नही, लोगो की...और वे सत्ताधारी , लोग नही है...अब तकरीरे दी जा रही है वृद्धों के सशक्तिकरण पर ...

कुछ बातें आपस में कितनी एक सी लगती है। जैसे सत्ताधारी पुरुष और सत्ताधारी नेता...इनकी स्थितियां एक जैसी ही होंगी ...हम इन्हे दोषी कह देते ...पर सत्ता ,सत्य और निष्पक्षता छीन लेती है...वह कोई भी हो.

कितनी बाते, कितने सोच और ना जाने कितने विचार आते है दिमाग में । पर हम उन्हे जाने देते है... क्योंकि हमें परिवर्तन भयानक लगता है जैसे मेरी मां को मेरा वस्तुत: ताम झाम से बचना, मेरा मनबढ़ होना दर्शाता हैं... मनबढ़ होना क्या होता है उन्हे नही पता , मुझे भी नही पता , पर इतना पता है, की जीवन जीने के सलीके में भेड़ चाल से हटकर लॉजिकल सोचना, मनबढ़ होना तो कत्तई नहीं है. और अगर है तो मैं इसे तारीफ समझती हूं.

✍️ Shruti alnkaar