तुम बहुत खूबसूरत लगती हो जब करती हो सादगी का श्रृंगार, जब लेती हो स्थिरप्रग्य अवतार , और फिर जब बना लेती हो श्रुतियों को अलंकार सच में , तुम बहुत खूबसूरत लगती हो ये लगना कितना अज़ब है और होना कितना गजब है कभी कभार या ज़ार बार , जब करती हो असत्य का तिरस्कार सच ..... दे जाती हो भावनाएं हजार और फिर वो भावनाएं कर जाती हैं , मेरे गलतियों में सुधार , अनगिनत बार असंख्य अदम्य अतुल्यनीय बढ़ जाती, है शोभा, तुम्हारे श्रृंगारों की तुम तब स्वयं से भी अद्भुत लगती हो शायद कुछ भी नहीं तुम , पर मेरी गिनती की शून्य भी तुम , अनंत भी तुम लगती हो और फिर एक नई परिभाषा गढ़ती हो कि तुम बहुत ही खूसूरत लगती हो। - श्रुति "अलंकार "


