यह कविता मैंने भारत की आत्मा पर कलंक
की तरह लगे हुई निर्भया कांड पर लिखी है
जिसमें कल्पना की गई है कि बर्बरता के बाद
यमराज और निर्भया के बीच क्या संवाद हुआ
होगा..
यह कविता नागार्जुन जी की कविता
"प्रेत का बयान" पर आधारित है..
"निर्भया का बयान"
लड़खड़ाती सी झुकी हुई दूषित
मानवता की विकराल कहानी
पूरी देह में समेटे हुए आई निर्भया
दिल्ली से नर्केश्वर समक्ष..
करुणा रुदन सुन विकल हुआ
स्वयं मृत्यु देव.. पूछा उसने
कौन दूत हमारा?
कौन तरीके से लिवा लाया
मृत्यु लोक में तुम्हें!!?
अकाल,भुखमरी,महामारी या
और दूत था कोई?.. कहो देवी..
ब्रह्मांड की चरम पीड़ा लिए वह बोली..
नहीं दूत था कोई आपका
ना मृत्यु ढंग ऐसा आपकी नियम पोथी में
हुआ यह नर लोक में
मानवता निज खोती में..
कुछ आदमखोर जो भारी आपके दूतों
पर नर लोक में बसते हैं..
कामुकता का विष लिए निज मानवता
को डसते हैं..
लिखी मेरे यमलोक गमन की कथा उन्होंने
दी मानव उर को भारी व्यथा उन्होंने..
चिल्लाकर यमदेव उठे
हिल उठा संपूर्ण लोक... बोले..
क्या मानवता उनकी नहीं जगी जो
जुड़े सत्ता लोग..
फिर बोली मैं भारी मन से..
इंसाफ की मशाल जलाने वाले
चंद प्रियजन थे... लेकिन!!
सत्ता के सब लोग तो थे मशगूल बयानों में
मानवता सोई उनकी थी ज्यों तलवार म्यानों में..!!
स्तब्ध नर्केश्वर बोले..
यहां निर्भय रहो तुम निर्भया
अब नहीं हो तुम इंसानों में!!


