याद करना चाहता हूँ तुझको
हिंदी पास भी आने की एक चाह तेरी सी * * * * *
पल भर से ही ज्यादा ठहर न सका
वहीं विचरण जहाँ पे होता है तेरा रोज ही,
* पुकार मुझको आवाहन सी तुमने दी
तैयार न थी थाल मेरी पूजन की... *
तेरे पुष्प चुन पाने की व्यथा अथाह है,
मेरे मन में बुन जाने की कथा मेरी है !
फिर वापस कहता हूँ मेरी नहीं थीं,
कब मुझको सहलाते सर मेरा मिली थीं;
हठ वय:सन्धि,लड़ाई भी तुझीसे हुई
पाकर तुझी को जीत भी अपनी हुई * * * * *
पर तेरे अपनत्व से छाई सब ओर खुशी,
ममतत्व से मेरे मन में आई नव रोशनी !