शाम ढले कुछ ख्वाबों का आंखों में आ जाना
धीरे धीरे बात पुरानी चुपके से कह जाना
ये भी क्या दिवानापन के जान भी दी और उफ़ ना किया
परवानो का इश्क़ तो देखो जलते जलते जल जाना
भूले भटके इश्क़ ना करियो, मैंने तो ये देखा है
इश्क़ में जीने वालों का अक्सर पागल हो जाना
तीन ही घर है आशिक़ के चाहो तो मिलते जाना
गली जान की या चौकी पुलिस की, गर ना मिले तो मेहखाना
एक ही गम है दुनिया में इज़हार-ए-मोहब्बत कैसे हो
उन तीन शब्द का उसके लब पर आते आते रह जाना
ए खुदा ना शोहरत माँगू ना ही कोई दौलत
मुझको मौत कुछ ऐसी देना, लिखते लिखते मर जाना