पाखंड के बादल घनेरे, जब हर कोने में छाए

समुचित समाज में बस गए, अंधविश्वास के साएं

काल की विकराल घड़ी में, विकट संकट से उबारने

तुम आए


इंसान ख़ुद के ही रचे जब मोहपाश में गया जकड़ा

लाख व्यर्थ की बातों को ले बैठा जीवन में पकड़ा

गहरी सब उलझी गाँठों को, इक-इक कर सुलझाने

तुम आए


जब निरंतर भिड़ रहे थे, सौ रूप धर्म के आपस में

करो युक्ति युं मिटे द्वंद्व सब, काम ये किसके वश में?

सौ पुष्पों को इक रज्जु में गुंजित कर, अद्भुत ज्ञानमाला बनाने

तुम आए


आज ज़रूरत इस धरा को, है तुम्हारी और ज़्यादा

इंसान रिक्तता में घुटता, और अंतःपशु है आमादा

केंद्र से ज़्यादा परिधि पर, लोग हैं जीने लगे

जीवन को शांतिकेंद्र पर पुनर्स्थापित करने 

तुम आओ


पर कदाचित् बैठे हो तुम, हर हृदयगुहा की खिड़की पर

चैन की इक प्यास बनकर, ज्ञान बनकर, बोध बनकर

अफ़सोस! खिड़की पर टगे हैं, काले पर्दे अनगिनत

काश निज चक्षु हम खोलें, पर्दों को झट से हटायें और

तुम आओ