नई आशाएं, अदम्य ऊर्जा, आँखों में सच के सपने

जीवन है कोई मृतशिला नहीं, फलित स्वप्न हैं करने


रंगमच है दुनिया सारी, सबका उसमें है किरदार

किए बिना अनिवार्य कर्म को, समझ नहीं सकते संसार


कौन असंभव लक्ष्य गढ़ा है, हो अभेद जो उस जन को

मग्न सदा निज कर्म में हो जो, कर समर्पित तन, मन, धन को


ध्यान रहे मंजिल ऊँची है, ना कि व्यक्तिगत अहंकार

गिरें, उठें, संभलें, दौड़ें; रहे सतत् दोषों पर वार


वक़्त कठिन ये भी गुजरेगा, छटेगी विघ्नों की बौछार

मंज़िल नहीं सफर नया होगा, इस सफर के भी उस पार