नींद! तू क्यूँ हर रोज़ चली आती है?
काम के बीच में, ख़लल पैदा कर जाती है।
कहती तो है कि विश्राम लेके आती हूँ
पर चार दिन के जीवन से दो दिन चुरा ले जाती है।
क्या तुझे पता नहीं कि कितने युद्ध कतारबद्ध हैं
तू आकर के, अंत: शत्रु को ही बलवान बनाती है।
इस अंधेरे और अंधेरे के बीच की दोलन गति में
तू दोनों ओर से सिर्फ अंधेरे को ही गहराती है।
एक सौदा करेगी?
तू आ! लेकिन कुछ इस तरह से
कि जो तुझे ओढ़ कर सोय वो फिर कभी न जागे
और जो जागे वो फिर कभी न सोय।
क्या इतना करने से भी कतराती है?
नींद! तू क्यूँ हर रोज़ चली आती है?
~सुकून


