चेहरे
रंग-बिरंगे चेहरे
भाँति भाँति के लेपो से सुसज्जित चेहरे
घर में, सड़क पर, सोशल मीडिया पर
बाज़ार में उत्पादों से ज़्यादा बिकते चेहरे
सब ओर से घेरे मुझे बन बादल जैसे सावन के
चहचहाते, मुस्कुराते, इतराते, बुलाते
रोक सकता है कोई कैसे ख़ुद को उनकी तरफ जाने से
कदम भी शायद चल रहे उन्हीं के चलाने से
और फिर मैं भी क्यों इंकार करूंँ
आबाद है खुशी जहाँ, उस तरफ जाने से
लेकिन ये क्या हो रहा है?
जो था इतने निकट क्यों दूर हो रहा है?
जिसके लिए ये कदम काँटों पर भी सरपट चले थे
क्यों वही रेत पर झलकते हुए नीर के जैसे
ओझल अन्यत्र हो रहा है?
मैं संभल जाता हूँ
नहीं, ये मेरा भ्रम है
वो सारे मुस्कुराते चेहरे करीब ही हैं
मैं प्रफुल्लित सा खड़ा व्याकुल
करने को घोषणा सारे जगत में कि
बहार की घड़ी
दहलीज़ पर खड़ी
मिल गए चेहरे मुझे जो लिए हैं
जलकुंडियाँ आनंद कीं बड़ीं-बड़ीं
मैं डूबकर जिनमें
करने वाला हूँ ख़ुद को धन्य
सब्र का फल मिल गया
अप्राप्त न अब कुछ अन्य
इस उद्घोषणा को लेकर ज्यों ही
उन चेहरों के ज़रा करीब और आया
नहीं,
ये क्या हुआ?
जिस-जिस चेहरे को पाने के लिए हाथ बढ़ाता
उस-उस चेहरे की कुछ और ही असलियत पाता
एक-एक कर हर एक चेहरे से नक़ाब फिसलता ही जा रहा है
कुरूपता का अंबार बढ़ता ही जा रहा है
मैं अभी भी उद्घोषणा की डोरी कसकर पकड़
मुड़ा पीछे वाले एक मुस्कुराते चेहरे को पकड़ने के लिए
पर उसका भी नक़ाब फिसला और
असलियत का बवंडर पंजों पर आ गिरा
ठिठक गए कदम वहीं
पर मुझे अब भी स्वीकार्य ये दृश्य नहीं
मैं चीख कर बोला जो सच था वहीं सच है
खो नहीं सकते मेरे प्यारे चेहरे सहसा कहीं
मेरी उद्घोषणा भीतर से झाँक रहीं है
बाहर निकलने का इंतज़ार कर रही है
इंतज़ार जो अब और भी दूर होता जाता है
जब विशाल भीड़ में एक और नया
नक़ाबधारी मुस्कुराता चेहरा जुड़ता जाता है
मैं कभी देखता हूँ बढ़ती हुई भीड़ की ओर
तो कभी सुनता हूँ अपनी उद्घोषणा का शोर
आशा जो बस टूटने की कगार पर है
फिर भी वो टूट सकती नहीं
क्योंकि निश्चित ही ये चेहरों की हालत है,
नियति नहीं


