नया पुल बन गया है तरक्की हो रही है
पर चैन खो रहा है मनुज धीरे-धीरे
पड़ोसियों और दोस्तों में तकरार बढ़ चली है
करीब आ रहा है कोई चुनाव धीरे-धीरे
विकृत तस्वीरें धर्म की आबाद हैं बाजार में
अदृश्य हो रहा है ख़रा धर्म धीरे-धीरे
अहं का समर्पण ही मूल में था धर्म के
पर वही बढ़ रहा है हर जगह धीरे-धीरे
जिस बोझ से मुक्ति को इंसान है बना
बस ढोय जा रहा है जन वही धीरे-धीरे
अपूर्ण ही रखा सदा उन्हीं कामनाओं ने
पूर्ण जिन्हैं करते रहे सब सतत् धीरे-धीरे
रिक्त हो चला है मन बोध करुणा प्रेम से
मगर घर भर रहा है हर माह धीरे-धीरे
मार्ग जीवन में सदैव उपस्थित है सामने
पर विमुख हो रहा है अखिल विश्व धीरे-धीरे
सौ आशाएं सुकून कीं जब ध्वस्त हो गयीं सभी
वही चुन रहा है फिर ‘सुकून’ धीरे-धीरे
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