नया पुल बन गया है तरक्की हो रही है

पर चैन खो रहा है मनुज धीरे-धीरे


पड़ोसियों और दोस्तों में तकरार बढ़ चली है

करीब आ रहा है कोई चुनाव धीरे-धीरे


विकृत तस्वीरें धर्म की आबाद हैं बाजार में

अदृश्य हो रहा है ख़रा धर्म धीरे-धीरे


अहं का समर्पण ही मूल में था धर्म के

पर वही बढ़ रहा है हर जगह धीरे-धीरे


जिस बोझ से मुक्ति को इंसान है बना

बस ढोय जा रहा है जन वही धीरे-धीरे


अपूर्ण ही रखा सदा उन्हीं कामनाओं ने

पूर्ण जिन्हैं करते रहे सब सतत् धीरे-धीरे


रिक्त हो चला है मन बोध करुणा प्रेम से

मगर घर भर रहा है हर माह धीरे-धीरे


मार्ग जीवन में सदैव उपस्थित है सामने

पर विमुख हो रहा है अखिल विश्व धीरे-धीरे


सौ आशाएं सुकून कीं जब ध्वस्त हो गयीं सभी

वही चुन रहा है फिर ‘सुकून’ धीरे-धीरे


Listen here: https://youtu.be/cYCnsatb8as