हर प्राण जब सजीव के

कटार गयी सहज रखी

भद्र, शिक्षित,समाज की

अभद्र नग्नता दिखी


बिक रही है लाश जिस दर

शनैः शनैः कतार बड़ी

सभ्य, नए समाज की

असभ्यता खुली दिखी


सजी हुई मेज़ पर

टाँग ज्यों गयी चखी

आधुनिक इस समाज की

पिछड़ी सोच सघन दिखी


विकल्पहीन हैं नहीं

विकल्प फिर भी ये चुना

दया इच्छुक मनुष्य की

अनंत क्रूरता दिखी


फल इसका कुछ इस कदर

नर खून का प्यासा हुआ नर

मानवों के समाज में

दानवता दुःखद दिखी


प्रेम और करुणा खोकर

चैन को तड़प उठा मन

ब्रह्मरूप मनुष्य की

क्षुद्रता घनी दिखी


चैन हेतु कर्म सब

पर बेचैनी का न छोर अब

सर्व समर्थ मनुष्य की

विवशता विकट दिखी


व्यक्तिगत है मामला क्या खाएँ क्या खाएँ नहीं

सच?

कैसा लगेगा गर तुम्हें ही खाने लगे कोई अभी?

कर कत्ल हृदय स्वयं का, बातों की ज्यों लगी झड़ी

तर्कवान मनुष्य की

कुतर्कता गज़ब दिखी


संविधान से है मिला हक, टोक कोई सकता नहीं

पर मूल हक जीने का उनका, कीमत कोई रखता नहीं?

स्वादलोलुपता के तले ज्यों, जान निरीह की दबी

हकधारी समग्र समाज की

दोगलीयत विपुल दिखी


दु:खद कि पहले से निहित है, हिंसा इक इक साँस में 

क्यों कत्ल कर वृद्धि उसे दें, फँस जिह्वा के उत्पात में

विकल्प बाइनरी नहीं है उपस्थित व्यवहार में

इसीलिए कोशिश ज्यों ही कम से कमतर की बढ़ी

चतुर सयान मनुष्य की

बुद्धिमत्ता सुखद दिखी


दर्द उनका आपका, अंतर है कुछ ज़्यादा नहीं

न हो यकीन तो देख लो, कर आँखें चार उनसे कभी

ये जानकर संवेदना ज्यों, अंतस् में आपके जगी

अंधकारमय जगत में

इक रश्मि आशा की दिखी


बात न यह तर्क की है, न ही है प्रोटीन की

यह तो है निज दासता व जीवन प्रेम विहीन की

हृदय की सीमाएँ ज्यों ख़ुद से तनिक आगे बढ़ी

हाड़-माँस के गठरे में

मनुजता चमकत दिखी


राहें सारीं हैं खुलीं

पकड़ शांतिपुर जो चली

तू इक स्वर जिस संगीत का

धुँधली उसकी छवि दिखी?


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छुपी तस्वीर || Chhupi Tasveer #HumanLifeMatters #AnimalLifeMatters - YouTube