जानता हूँ ख़ुद को, बड़ी अच्छी तरह से

'सुकून' ही तो हूँ मैं, नाम और जनम से।


फिर क्यों है ये प्रश्न, कुदेरता मेरे मन को

ये मैं ही हूँ या जानता हूँ सिर्फ अपने नाम को।


तू नहीं ये नाम तेरा, तू नहीं ये ज़िस्म है

तू नहीं वो आत्मा, तू नहीं वो भस्म है।


ये ज़िस्म तेरा आवरण या आवरण तू ज़िस्म का

क्यों नहीं ख़ुद पूछता, है शख़्स तू किस किस्म का।


अब और इंतजार नहीं, तुझे उठना ही होगा

राहें बड़ी कठिन हैं, पर चलना ही होगा।


पथ पर ही सच का सूरज, दैदीप्यमान होगा

तम सारा हट जाएगा, तू ख़ुद से अनजान ना होगा।


~ सुनील कुमार निरंजन 'सुकून'