उगते हुए सूरज हो तुम,

ढ़लती हुई शाम हुँ मैं ।

तेरी कदमों में पुरी आसमान हो,

आसमान से टपकती बुँद हुँ मैं...।


सपनों की पथ पर बढ़ चलो तुम,

पथ पर बिखरती पतवार हुँ मैं ।

फूलों की खिली कलियाँ हो तुम ,

बिखरा हुआ भटकता भौंरा हुँ मैं...।।


प्राकृतिक रचनाकार कवि-सुनील