"सपनों की बरसात होते-होते, एक घास पर बुँद रूपी 'उम्मीद' बनकर ठहर गयी है, जो प्रातः की किरणों में चमक जाती है और शामों की किरणों बिखर जाती है"
प्राकृतिक रचनाकार कवि-सुनील


"सपनों की बरसात होते-होते, एक घास पर बुँद रूपी 'उम्मीद' बनकर ठहर गयी है, जो प्रातः की किरणों में चमक जाती है और शामों की किरणों बिखर जाती है"
प्राकृतिक रचनाकार कवि-सुनील