एक बुँद सी जिन्दगी टपकती जा रही है !
कभी पत्तो पर जा ठहरती ,
कभी गँगा में तैरती जा रही है ।
एक बुलबुला सी भरी है जिन्दगी !
पल-पल भर-भर की ,
सौन्दर्य किरणों की सुन्दरता दिखा रही है ।।
कर ना अभिमान इन बूँदों पर !
बह जाये तो सागर ठहर जाये तो नदियाँ,
प्यासी भरीं एक सिसकियाँ बहा रहीं हैं ।
घूमती है दुनिया इन बूँदों में सिमट कर !
पग-पग डालियों पर जा ठहरती ,
महसूस दिलों में कलियाँ खिला रही है ।।
-सुनील


