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एक किसान का जब अवतार हुआ

एक किसान का जब अवतार हुआ

तन पे कोई वस्त्र न था

था केवल हाथों में वो औजार लिए

भटकना न उसे अब जंगल - जंगल

न था सोना भूखे पेट लिए


शिशुओं के उस रुदन को, जवानो के बाहुबल को

आकाश ने छप्पर अब फाड़ दिया, माँ धरा ने भी हृदयी उपहार दिया

ऊगा तब एक दाना अन्न का

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