बीच दिलों के उठी हुई दीवारें  हैं 

शब्द आपके धारदार तलवारें  हैं 


कई रंग  चेहरे के भीगे बूँदों से 

इन्द्रधनुष पर बारिश की बौछारें हैं 


आसमान है ज़ख़्मी,तीखी चोंचों से 

बग़ुलों की भी उड़ती हुई क़तारें हैं 


जब उदास हम ख़िजाँहमारी आँखों में

अगर रहें ख़ुश,चारों ओर बहारें हैं


होगी कैसे पार नदी की गहराई

नाव फूस की,मिट्टी की पतवारें हैं 


-डॉ. सुनील कुमार