जब भी आओगे कभी
लौट के इस शहर में तुम
गुलमोहर तुमको जो देखेंगे
बिखर जाएँगे।
यों तो बिछुड़े हुए तुमसे
कई युग बीत गये
तुमने देखा नहीं मुड़ कर
कभी चट्टानों को
कैसा है पेड़ वो पीपल का
मुहल्ले वाला
तुम तो भूले हो हरे वन के
सब निशानों को
जब भी आओगे कभी
लौट के इस शहर में तुम
सूर्य के जितने भी चेहरे हैं
निखर जाएँगे।
होंठ की शाख़ से
तोड़े थे प्रेम-फल हमने
देह पर बैंगनी नीले
चकत्ते अंकित थे
मेघ घिर आये थे
अक्षर लिखे थे बूँदों ने
था जो विस्तार भुजाओं का
उसमें सीमित थे
जब भी आओगे कभी
लौट के इस शहर में तुम
साथ जिस रस्ते पे चलते थे
उधर जाएँगे।
-डॉ. सुनील कुमार


