बस एक वोट से क़ीमत नहीं है ज़्यादा
क़ीमत उसकी क्या जो कई बार किया गया वादा
गाँव घर पर एक कंबल एक साड़ी से गिने जाते
परदेस में तो एक वोट की गिनती में भी नहीं आते
न कोई जाने देना चाहता
न कोई आने देना चाहता
चाहते हैं वहीं रहें, जो जहां वो वहीं टिक जाए
चाहते हैं इस बार बिना वादे के ही बिक जाए
बस एक उम्मीद है, घर वापस जाना है
गाँव में अपना भी एक ठिकाना है
रोको न रास्ता अब जब घर की तरफ़ हैं आते
देते अगर नौकरी तो मीलों पार दूसरे देस न जाते
बचाकर लाते थे कपड़े तोहफ़े छुट्टियों में जब आए
वायरस का डर तो, हो गए हम पराए
कर दिया तुमने हमें बहुत मजबूर है
रखो पाँच किलो चावल अपने पास
और कोई पहचान नहीं, नाम हमारा मज़दूर है
रास्ता है लंबा बड़ा पर अपना भी ग़ुरूर है
~सुमित

