आज मेरे सपनो की चमक नें फिर मेरी निगाहों को चौन्धया दिया,
उन सपनो को पूरा होना ही होगा जिन्होंने ने मुझे मेरे अपनों से जुदा किया ||
आज फिर से अपनी यादों के पन्हे पलट के देखता हूं,
कुछ अनसुलझे धागों को पलट के देखता हूं,
शायद मिल जाए उस राह का पता, जिसने औरों को सफलता का जाम चखा दिया,
मेरे लिए भी उगे वो सूरज, जिसने मुझे छोड़ औरों के आँगन को रोशन्य किया ||
आज मेरे सपनो की चमक नें फिर मेरी निगाहों को चुंध्या दिया,
उन सपनो को पूरा होना ही होगा जिन्होंने ने मुझे मेरे अपनों से जुदा किया ||
उस बाप की मेहनत का ऋण चुकाना बाकी है अब तक,
उस माँ के त्याग को अपनी सफलता से तिलक लगाना बाकी है अब तक,
कभी तो बयान करूँगा अपने सफर को इन अल्फ़ाज़ों में,
" मेरे दफ्तर की खिड़की से मीठी लगी वो धूप आज,
चौन्धया देती थी जो निगाहें उम्मीदों की कल तक.."
बास आज फिर अपनी यादों के पेड़ से सपनो की एक टहनी को तोड़ चुरा लिया,
जिसने इस लंबी ज़िन्दगी के सफर में टूटने के बाद फिर से मुझे जोड़ खड़ा किया ||
आज मेरे सपनो की चमक नें फिर मेरी निगाहों को चुंध्या दिया,
उन सपनो को पूरा होना ही होगा जिन्होंने ने मुझे मेरे अपनों से जुदा किया ||
-- अल्फ़ाज़ @ सुमित शर्मा