मेरे दफ्तर की खिड़की से मीठी लगी वो धूप आज
चौन्धया देती थी जो आँखें उम्मीदों की कल तक ||
वही मुसाफिर है वही गरूर है वही कारवां है आज,
अलग था तो सिर्फ सफर फर्श से फलक तक ||
छू गयी हवा चुपके से इन पलकों को आज,
नम आँखों को तले सहला जाती थी जो कल तक ||
खिड़की मेरी पे पाया कुछ प्यासी आँखों को तककते आज,
शायद चाहत रख बैठी थी वो भी फलक के सफर की,
इन्ही आँखों में एक नज़र मेरी भी थी उठी कल तक ||
उममीदों की किश्ती में सवार हूं आज,
जिस को ढूंढती थी निगांहे बेपन्हा कल तक ||
कुछ पूरी कर पाया कुछ का अरमाँ है आज,
जो चाह चुभती थी चाहते-ए-खंजर बन कल तक ||
किसी की मोहब्बत किसी की चाहत किसी की इबादत तले इतना ऊपर हूं आज,
पाया जिनको था सहारा गमे-ए-तन्हाई में अपना कल तक ||
गरूर है बेपन्हा अपनी चाहत पे आज,
जिसने रोते हुए भी लड़ना सिखाया गंमो से कल तक ||
याद रखने की चाहत उन टूटे उम्मीदों को नहीं है आज,
जिनके बीच रोया मैं कई मर्तबा कल तक,
मेरे दफ्तर की खिड़की से मीठी लगी वो धूप आज
चौन्धया देती थी जो आँखें उम्मीदों की कल तक ||
-- अल्फ़ाज़ @ सुमित शर्मा


