झांकता हूँ गली की उस नुक्कड़ को अक्सर,

अकस्मात आया करती थी जहाँ से तुम मुस्कुराते हुए,

देखा कुछ दिनों से भगवान् की मूरत वहां पड़ी,

मेरा तो इंतज़ार ही मेरी इबादत हो गया॥


हलके पाँव धरे बढ़ता हूँ रसोई की तरफ,

भ्रम रहता हैं तंज़ कसोगी कोई मुझपर तुम इतराते हुए,

नाम तेरा क्यों पुकारते हैं ये लब रोजाना,

इन्हें भी तेरी जुदाई की आदत नहीं पड़ी,

सुने अपना नाम तेरे लबों से ऐ सनम अब तो इक ज़माना हो गया॥


तेरी हर चीज़ मुझे तंज़ कसा करती हैं आजकल,

सह लेता हूँ ताने अक्सर दिल को बहलाते हुए,

मीठी नोक झोंक की किताब, एक आरसे से है दिल में बंद पड़ी,

तुझे चिढ़ाने क लिए इन होठों को खुले अब तो एक जमाना हो गया ॥


जाते कहा था तुमने अच्छे दिनों की तुम्हारे कामना करती हूँ,

पर तुम्हे देखे बिना मेरे लिए कभी उजाले ही न हुए,

अंधेरो से रंजिश की गवाहियां अब तो दीवारें भी दे पड़ी,

रौशनी के रंग का एहसास किये भी अब तो एक ज़माना हो गया ॥


आ जाना घर वापिस जल्द ही मेरी साँसों को लेकर,

साथ खींच ली थी जो तुमने आखिर अलविदे लेते हुए,

तभी से साँसों और धड़कन क रिश्ता में कुछ उलझन सी है पड़ी,

साबित हो गया साँसों से बढ़कर तेरा नाम मेरे लिए जीने का सहारा हो गया ॥


झांकता हूँ गली की उस नुक्कड़ को अक्सर,

अकस्मात आया करती थी जहाँ से तुम मुस्कुराते हुए,

देखा कुछ दिनों से भगवान् की मूरत वहां पड़ी,

मेरा तो इंतज़ार ही मेरी इबादत हो गया॥


अल्फ़ाज़ ~ सुमित शर्मा