
आलीशान घर के एक मखमली कोने में बैठ,
बड़ी आसानी से कह दिया कर दो एलान-ए-जंग ||
कभी उन शहीदों के आँगन में झांकना,
तरसी निगाहें जो रोज दहलीज घर की आंसुओं से धोती हैं,
एक बाप की उन सिसकियों को भांपना,
जो हर रात पलकों को भिगो बड़ी मशक्त से सोती हैं,
क्या रहा होगा कलेजा उस माँ का,
जिसने तिलक किया होगा अपने लाल का संग लाल रंग.
और हमने आलीशान घर के एक मखमली कोने में बैठ,
बड़ी आसानी से कह दिया कर दो एलान-ए-जंग ||
उस शहीद के घर अक्सर राखी की थाली सज्जति होगी,
गलती से अक्सर नाश्ते की आवाज़ लगती होगी,
सिन्दूर की चुटकी अक्सर मांग की और बढ़ती होगी,
फिर टंगा देख एक भाई, एक बेटे ,एक पति की फोटो पे हार आँखें बेपन्हा पानी बरसती होंगी,
सियासत का मोहरा बना जिसे चढ़ा दिया भेंट शहीदी के,
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