आलीशान घर के एक मखमली कोने में बैठ, बड़ी आसानी से कह दिया कर दो एलान-ए-जंग || कभी उन शहीदों के आँगन में झांकना, तरसी निगाहें जो रोज दहलीज घर की आंसुओं से धोती हैं, एक बाप की उन सिसकियों को भांपना, जो हर रात पलकों को भिगो बड़ी मशक्त से सोती हैं, क्या रहा होगा कलेजा उस माँ का, जिसने तिलक किया होगा अपने लाल का संग लाल रंग. और हमने आलीशान घर के एक मखमली कोने में बैठ, बड़ी आसानी से कह दिया कर दो एलान-ए-जंग || उस शहीद के घर अक्सर राखी की थाली सज्जति होगी, गलती से अक्सर नाश्ते की आवाज़ लगती होगी, सिन्दूर की चुटकी अक्सर मांग की और बढ़ती होगी, फिर टंगा देख एक भाई, एक बेटे ,एक पति की फोटो पे हार आँखें बेपन्हा पानी बरसती होंगी, सियासत का मोहरा बना जिसे चढ़ा दिया भेंट शहीदी के, "अमन की आशा" कह फिर एक रोज गले लग हंसे उन नापाक जमीरों के, वतन पे मिटने वालों का कर्ज क्या हम चुकाएंगे, अपनी उलझनों में उलझते आये हैं उन्ही को उम्र भर सुलझाएंगे, सबूत शहादत का मांगने वाले न जाने किस रूह से शहीदी का शोक मनाएंगे, बेशर्मी का लिबास ओढ़ इसे ही एक सियासी मुद्दा बनाएंगे, तिरंगे के सामने अक्सर लगाया होगा नारा "जय हिन्द" का, बात बने गर जिगर हो "जय हिन्द" कह लंबी नींद सोना तिरंगे के संग, और हमने आलीशान घर के एक मखमली कोने में बैठ, बड़ी आसानी से कह दिया कर दो एलान-ए-जंग ||                                                                                                                                          अल्फ़ाज़ ~  सुमित शर्मा