घोर रात के दरिये में
मशाल जलाये निकला हूं
सहर के होने का सब्र नहीं
मैं रात सफर बनाए निकला हूं
न आसमां ज़द में न ज़मी पैरों में
ख्वाबों की पलकों को आंखों में
समेटे, चंद आरजू लिए निकला हूं
मैं रात सफर बनाए निकला हूं
संघर्ष रण पर पग अपना धर
तन-मन सब किए समर
काल साथ लिए निकला हूं
मैं रात सफर बनाए निकला हूं