कुछ कहकहे मुस्कान सारी
हमने समेटी पोटली में
और उसमें रूठने की
ढेर वह सारी अदाएं
बाँध दी फिर गाँठ एक की
वह कभी खुलने न पाए
और उसको आँसमा में
चाँद जैसे टाँक आये
शायद प्यार अमर हो जाये।।
बारिशों की ढेर बूंदों में
चुना एक बूँद को
जो लिपटकर थी मगन
उस दूब के उच्छ्वास में
दोनों हथेली जोड़कर अंजुली बना
और बूँद से सागर बनाकर
नमक सारा आंसुओं का
हम उसी में घोल आये
शायद प्यार अमर हो जाये।।
वृक्ष से टूटे हुए
एक श्यामल पात में
और दिसंबर की समूची
ठंडी सूनी रात में
एक चातक के ह्रदय से
विरह की आग लेकर
मौन की संगीत में
मांझी के गीत पिरोकर आए
शायद प्यार अमर हो जाये ।।