कितने महल और घर बनाए उन हाथों ने
टीन, प्लास्टिक और फूस का रहा उनका आशियाना,
न इज़्ज़त दे पाए न मेंहताना, मगर यूँ अज़ाब देना -
कहाँ मूँह छुपाएँगे हम, बोलो ऐ ज़माना..

- सुमिता