जन्म से लेकर और अब तक

नसीब मुसीबतें हजार होती है

दिल है जख़्मी और दबी हूं मन में

पर ये दर्द , सिले होठों से कहां बयान होता है

औरत होना कहा आसान होता है।


बेटी हुं, बहन हूं किसी कि

कभी तो पूछो क्या इच्छा है मेरी

थोड़ी सी ही तो ख़्वाहिशें है; मुझे उड़ने दो

मेरे लिए कहां पूरा आसमान होता है

औरत होना कहां आसान होता है।


चूल्हा-चौकी मेरी किस्मत ही सही

पर किताबें भी मेरे हिस्से रहने दो

जो पंख मिले मेरे भाई को

उससे थोड़ा मुझे भी उड़ने दो।


बेटी हूं तो घर सही, पत्नी हूँ तो घर सही, बहन हूं तो घर सही

बंदीसे जमाने भर कि है मेरे पैरों में

और आज़ादी महज आंगन कि

लाचार ये आँखें मेरी समूंद्र को समेटे हुए

अक्सर क्यूँ बहने को बेताब रहता है

औरत होना कहां आसान होता है।


कब आऊंगी मैं इस घूंघट से बाहर

कब चलूंगी मैं अपनी मर्ज़ी कि डगर

कब उठुंगी मैं अपनी खुद कि सहर मे

क्यूंँ मेरा खुद से ये हमेशा सवाल रहता है

औरत होना कहां आसान होता है।


बेटी हूं किसी कि, तो बहन भी हूं किसी कि

पत्नी हूं तो माँ भी हूं किसी कि

रूकती नहीं और कभी थकती भी नहीं

इन कारदारों का कहाँ कभी शाम होता है

औरत होना कहांँ आसान होता है।