बेवफ़ाई वो बड़ी अलहदा होती है

जान से रूह जिसमें जुदा होती है,


रग-रग बिना ख़ून शर्मिंदा होती है

जान आदमी की जब मुर्दा होती है,


हश्र में नेकियां शायद काम आती हैं

धन-दौलत सब फिर बेहूदा होती है,


झूठी शोहरतें सब फिर ढह जाती है

जीते-जी जो उसे बिल्कुल ख़ुदा होती है


बिछड़ते हुए रूह, जिस्म को बता जाती है 

मिट्टी होकर भी तेरी ख्वाहिशें बड़ी उम्दा होती है 


जिंदगी कुछ और सांसों को तरसती है

रूह मगर तय वक़्त पर विदा होती है


किस तसव्वुर में 'सुमित' इतराते फिरो हो,

जिंदगी साँसों से अनचाहा सौदा होती है।