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आगे सरे-बाजार जो नीलाम होती है

उसे लोग बे-इज्ज़त कहा करते हैं,

यहां घर में बे-लिबास जिस्मों को

बड़े-बुजूर्ग ही इज्ज़त कहा करते हैं।


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वफ़ा का सलीक़ा है तभी तो कहता हूं

के तुम चाहे रातों,ख़्वाब-ओ-दिल में रहो

मगर बरतरी होगी नहीं इसमें रिश्ते की,

ग़र जो तुम हर-घड़ी मुस्तक़बिल में रहो


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तड़प जब-जब सही है मैंने पेचीदा राहों की

जुनूँ ने तब-तब तोड़ी है गर्दन मेरी आहों की

ज़रूरत से ज़्यादा न सुनी आवाज़ अफ़वाहों की

याद रही है हर-दम मंज़िल मुझे निगाहों की।


- सुमित सैनी